प्रारंभिक जीवन और संघर्ष
सितारा देवी का जन्म 8 नवंबर 1920 को कोलकाता में हुआ था। उनका परिवार बनारस के ब्राह्मण परिवार से था, जो बाद में कोलकाता में बस गया। उनके पिता, सुखदेव महाराज, संस्कृत के विद्वान और कथक के शिक्षक थे। बचपन में, बदसूरत समझे जाने के कारण, उनके माता-पिता ने उन्हें घर की नौकरानी को सौंप दिया था, लेकिन बाद में नौकरानी ने उन्हें वापस लौटा दिया। इस घटना ने उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ लाया।
नृत्य की ओर अग्रसरता
मुंबई आने के बाद, सितारा देवी ने 11 वर्ष की आयु में अतिया बेगम पैलेस में रवींद्रनाथ टैगोर, सरोजिनी नायडू और सर कोवासजी जहांगीर के समक्ष नृत्य प्रस्तुति दी। रवींद्रनाथ टैगोर उनकी नृत्य प्रतिभा से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उन्हें 'नृत्य सम्राज्ञी' की उपाधि से सम्मानित किया। यह उपाधि उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनी।
फिल्मी करियर और योगदान
12 वर्ष की आयु में, सितारा देवी ने फिल्मों में नृत्य करना शुरू किया। उनकी प्रमुख फिल्मों में 'उषा हरण' (1940), 'नगीना' (1951), 'रोटी' (1938), और 'वतन' शामिल हैं। 1957 में आई 'मदर इंडिया' में उन्होंने पुरुष वेश में होली नृत्य किया, जो आज भी याद किया जाता है। इस फिल्म के बाद उन्होंने फिल्मों में नृत्य करना बंद कर दिया और शास्त्रीय नृत्य के प्रचार-प्रसार में जुट गईं।
निजी जीवन और विवाद
सितारा देवी का निजी जीवन भी काफी चर्चा में रहा। 8 वर्ष की आयु में उनकी पहली शादी हुई, लेकिन नृत्य के प्रति समर्पण के कारण उन्होंने यह शादी तोड़ दी। बाद में, उन्होंने अभिनेता नजीर अहमद खान से शादी की, जो उनसे 16 वर्ष बड़े थे और पहले से शादीशुदा थे। इस शादी के लिए उन्होंने अपना धर्म भी बदल लिया था। हालांकि, यह शादी भी सफल नहीं रही। इसके बाद, उन्होंने के. आसिफ से शादी की, लेकिन यह रिश्ता भी ज्यादा समय तक नहीं चला। अंततः, उन्होंने गुजराती व्यवसायी प्रताप बरोट से शादी की, जिससे उन्हें एक बेटा, रंजीत बरोट, हुआ, जो एक प्रसिद्ध संगीतकार हैं।
सम्मान और पुरस्कार
नृत्य और कला में उनके योगदान के लिए, सितारा देवी को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और पद्मश्री से सम्मानित किया गया। बाद में, जब उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया, तो उन्होंने इसे ठुकरा दिया और भारत रत्न की मांग की, यह कहते हुए कि उनके योगदान के लिए यह सम्मान पर्याप्त नहीं है।
शिक्षक के रूप में भूमिका
सितारा देवी ने न केवल स्वयं नृत्य किया, बल्कि मधुबाला, रेखा, माला सिन्हा और काजोल जैसी प्रमुख बॉलीवुड अभिनेत्रियों को भी कथक सिखाया। उनकी शिक्षण शैली और नृत्य के प्रति समर्पण ने उन्हें एक महान गुरु के रूप में स्थापित किया।
अंतिम समय और विरासत
लंबी बीमारी के बाद, 25 नवंबर 2014 को 94 वर्ष की आयु में सितारा देवी का निधन हो गया। उनकी विरासत आज भी जीवित है, और भारतीय नृत्य में उनका योगदान अमूल्य है। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि कठिनाइयों के बावजूद, समर्पण और मेहनत से किसी भी लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।
निष्कर्ष
सितारा देवी का जीवन संघर्ष, समर्पण और नृत्य के प्रति अटूट प्रेम की कहानी है। बचपन में बदसूरत कहकर त्यागी गई इस लड़की ने न केवल बॉलीवुड में नृत्य की पहचान बनाई, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत बनीं। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि कठिनाइयों के बावजूद, समर्पण और मेहनत से किसी भी लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।
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