'इन गलियों में' मूवी रिव्यू: प्रेम, समाज और सोशल मीडिया का ताना-बाना

 

'इन गलियों में' मूवी रिव्यू: प्रेम, समाज और सोशल मीडिया का ताना-बाना

14 मार्च 2025 को रिलीज़ हुई 'इन गलियों में' एक रोमांटिक ड्रामा है जो प्रेम, समाज और सोशल मीडिया के प्रभाव को बारीकी से दर्शाती है। 

inn galiyon Mein
इन गलियों में मूवी रिव्यू

 


कहानी की झलक

फिल्म की कहानी लखनऊ की तंग गलियों में बसे हिंदू-मुस्लिम समुदाय की है, जहां लोग सदियों से मिल-जुलकर रहते आए हैं। हरीया (विवान शाह) और शब्बो (अवंतिका दासानी) दोनों सब्ज़ी विक्रेता हैं। हरीया सोशल मीडिया के 'रील्स' ट्रेंड में फंसा हुआ है और शब्बो से प्रेम करता है, लेकिन शब्बो उसकी भावनाओं को नज़रअंदाज़ करती है। मिर्ज़ा (जावेद जाफ़री) मोहल्ले के बुजुर्ग हैं, जिनकी चाय की दुकान पर लोग जमा होते हैं। स्थानीय नेता अजय तिवारी (सुशांत सिंह) के आगमन से मोहल्ले की शांति भंग होती है, जो अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए समुदाय में फूट डालने की कोशिश करता है। 


निर्देशन और पटकथा

निर्देशक अविनाश दास ने फिल्म के परिवेश को वास्तविकता के करीब दिखाने का प्रयास किया है। हालांकि, कहानी की शुरुआत मजबूत है, लेकिन क्लिशे का उपयोग अंत में फिल्म की प्रभावशीलता को कम करता है। फिल्म में राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को छूने की कोशिश की गई है, लेकिन पटकथा में नवीनता की कमी महसूस होती है। 


अभिनय

  • जावेद जाफ़री (मिर्ज़ा): बुद्धिमान चायवाले के रूप में उनकी भूमिका प्रभावशाली है, जो फिल्म में संतुलन लाती है।

  • विवान शाह (हरीया): प्रेम में डूबे युवक के रूप में उनका प्रदर्शन संतोषजनक है, लेकिन लखनऊ की बोली में थोड़ी कमी नजर आती है।

  • अवंतिका दासानी (शब्बो): नवोदित अभिनेत्री के रूप में उन्होंने अपनी भूमिका को ठीक से निभाया है, लेकिन उनके किरदार में और गहराई की आवश्यकता थी।

  • सुशांत सिंह (अजय तिवारी): राजनीतिक नेता के रूप में उनका अभिनय प्रभावशाली है, जो कहानी में तनाव लाता है।


संगीत और तकनीकी पक्ष

फिल्म का संगीत और सिनेमैटोग्राफी कहानी के मूड को प्रतिबिंबित करते हैं, लेकिन कोई भी गीत विशेष रूप से यादगार नहीं है। तकनीकी दृष्टिकोण से, फिल्म औसत दर्जे की है।


निष्कर्ष

'इन गलियों में' एक ईमानदार प्रयास है जो प्रेम, समाज और सोशल मीडिया के प्रभाव को दर्शाता है। हालांकि, कहानी में नवीनता की कमी और क्लिशे का उपयोग फिल्म की प्रभावशीलता को कम करता है। यदि आप सामाजिक मुद्दों पर आधारित फिल्में पसंद करते हैं, तो इसे एक बार देखा जा सकता है।


रेटिंग: 3/5

 

 

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