'मैं आमिर खान के पीछे नहीं खड़ा होऊंगा' – रणदीप हुड्डा को 19 साल बाद हुआ पछतावा, जब ठुकरा दी थी 'रंग दे बसंती' जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्म

'मैं आमिर खान के पीछे नहीं खड़ा होऊंगा' – रणदीप हुड्डा को 19 साल बाद हुआ पछतावा, जब ठुकरा दी थी 'रंग दे बसंती' जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्म

ज़िंदगी आपको कई मौके देती है, आपकी किस्मत आपके सफ़लता के दरवाजे पे दस्तक देती है जिसे आपको पहचानना होता है। जो उस दस्तक को पहचान जाता है वो अपनी सफ़लता की राह में आगे बढ़ जाता है। और जो नहीं पहचान पाता उसके संघर्ष का समय बढ़ जाता है। हमारी बॉलीवुड फ़िल्म इंडस्ट्री भी ऐसी ही है। जहां आपको कई मौके मिलते हैं लेकिन हम उसे पहचान नहीं पाते। ऐसे ही रणदीप हुड्डा के करियर में ज़िंदगी ने उन्हें मौका दिया लेकिन अपनी जाट अकड़ की वजह से उन्होंने वो मौका नकार दिया। क्या है पूरी कहानी आईए आपको बताते हैं। 

रणदीप हुड्डा को रंग दे बसंती रिजेक्शन का पछतावा
रणदीप हुड्डा को 19 साल बाद हुआ पछतावा


रणदीप हुड्डा को 'रंग दे बसंती' को ठुकराने का 19 साल बाद हुआ पछतावा

बॉलीवुड में कई बार ऐसे मौके आते हैं जब कलाकारों को बड़े ऑफर्स मिलते हैं, लेकिन वे या तो उन्हें समझ नहीं पाते या फिर अहंकार, भ्रम और आत्मविश्वास के बीच फैसला ऐसा कर बैठते हैं, जो उनके पूरे करियर की दिशा ही बदल देता है। ऐसा ही कुछ हुआ था अभिनेता रणदीप हुड्डा के साथ, जब उन्होंने साल 2006 में रिलीज हुई सुपरहिट फिल्म ‘रंग दे बसंती’ का ऑफर ठुकरा दिया था।

आज, 19 साल बाद रणदीप हुड्डा इस फैसले पर खुलकर बोले हैं और स्वीकार किया है कि यह उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी भूलों में से एक थी।


'रंग दे बसंती' जैसी फिल्म का ऑफर... और ठुकरा दिया!

रणदीप हुड्डा ने हाल ही में शुभांकर मिश्रा के पॉडकास्ट में बताया कि निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने उन्हें भगत सिंह का रोल ऑफर किया था, जो बाद में सिद्धार्थ ने निभाया। उन्होंने कहा:

“मैंने ऑडिशन दिया था और मुझे ये बहुत पसंद आया। राकेश ओमप्रकाश मेहरा खुद मुझसे मिलने आते थे। कभी-कभी शराब के नशे में भी ड्राइव करते हुए कहते थे – कर ले पिक्चर... कर ले।”

रणदीप बताते हैं कि वो फिल्म करना चाहते थे, लेकिन तभी उनके करियर में एक और बड़ा मौका आया और वो इस दुविधा में फंस गए।


जाट अकड़ और राम गोपाल वर्मा का असर

रणदीप हुड्डा ने आगे बताया कि उस वक्त राम गोपाल वर्मा ने उन्हें अपनी फिल्म ‘डी’ में लीड रोल का ऑफर दिया था और कहा:

“तू आमिर खान के पीछे पोस्टर में खड़ा होगा?”

बस फिर क्या था – रणदीप की "जाट अकड़" जाग गई और उन्होंने ‘रंग दे बसंती’ करने से मना कर दिया। उस वक्त उन्हें लगा कि लीड रोल करना ज्यादा मायने रखता है बजाय एक बड़े स्टार के साथ सपोर्टिंग रोल निभाने के।


'रॉक ऑन' भी छोड़ी, फिर पछतावा

रणदीप हुड्डा ने यह भी बताया कि उन्होंने ‘रॉक ऑन’ जैसी म्यूजिकल हिट फिल्म को भी इसी तरह ठुकरा दिया था। उनके मुताबिक, उन्हें शुरुआत में लगा कि “बस मैं कैमरे के सामने आ जाऊं, भीड़ अपने आप लग जाएगी।”

लेकिन बाद में उन्होंने महसूस किया कि इंडस्ट्री में सिर्फ टैलेंट नहीं, बल्कि नेटवर्किंग, प्रजेंटेशन और मार्केटिंग भी उतनी ही ज़रूरी हैं।


‘रंग दे बसंती’ – जो बन सकती थी करियर टर्निंग पॉइंट

साल 2006 में रिलीज हुई फिल्म 'रंग दे बसंती' ना सिर्फ ब्लॉकबस्टर साबित हुई, बल्कि इसने नेशनल अवॉर्ड भी जीता। फिल्म को ऑस्कर और बाफ्टा जैसे इंटरनेशनल मंचों पर भी पहचान मिली।

अगर रणदीप उस फिल्म का हिस्सा बनते, तो शायद उनका करियर किसी और दिशा में जाता। वे खुद कहते हैं:

“अगर मैंने वो फिल्म की होती, तो मैं आज एक अलग लीग का एक्टर होता।”


आज रणदीप की ‘जाट’ कर रही है बॉक्स ऑफिस पर धमाल

हाल ही में रिलीज हुई रणदीप हुड्डा की फिल्म ‘जाट’, जिसमें उन्होंने एक खलनायक की भूमिका निभाई है, बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन कर रही है। फिल्म में सनी देओल हीरो की भूमिका में हैं और रणदीप ने अपने दमदार अभिनय से दर्शकों का दिल जीत लिया है।


करियर की धीमी रफ्तार के पीछे खुद की सोच जिम्मेदार

रणदीप हुड्डा ने इस बातचीत में ये भी स्वीकारा कि इंडस्ट्री में “मैं ही काफी हूं” वाली सोच ही उनकी प्रगति में रुकावट बनी। उन्होंने कहा:

“कला को प्रेजेंट करना, पैकेज करना भी जरूरी है। ये मुझे बहुत देर से समझ आया।”


क्या आज भी समय है सुधारने का?

रणदीप हुड्डा भले ही उस वक्त 'रंग दे बसंती' ना कर पाए हों, लेकिन आज भी उनकी एक्टिंग और गहराई से भरे किरदारों की सराहना होती है। उन्होंने ‘सरबजीत’, ‘हाईवे’, ‘लाल रंग’, ‘कैप्टन’ जैसी फिल्मों में अपना लोहा मनवाया है।

उनका पछतावा एक सीख है – कि मौका और समय दोबारा नहीं आते।


निष्कर्ष

बॉलीवुड की चमक-धमक में सही फैसले लेना आसान नहीं होता। रणदीप हुड्डा की कहानी उन सभी कलाकारों के लिए एक आईना है जो आत्ममुग्धता या भ्रम के कारण गलत दिशा में कदम उठा बैठते हैं। लेकिन यह भी सिखाती है कि पछतावा चाहे कितना भी बड़ा हो, अगर आत्मस्वीकृति हो और मेहनत जारी रहे, तो नई मंज़िलें भी पाई जा सकती हैं।


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नोट: इस लेख में दी गई जानकारी विभिन्न विश्वसनीय समाचार स्रोतों और रिपोर्ट्स पर आधारित है, जिन्हें हमने अपने शब्दों में प्रस्तुत किया है।

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